Education level
आओ जाने शिक्षा का स्तर
शिक्षा का मतलब है सत्य की तलाश - बेशक परम सत्य की तलाश न सही, जो वस्तु फिलहाल सामने मौजूद हो, उसी के सत्य की तलाश सही। विद्यार्थी स्वाभाविक तौर पर जिज्ञासु होते हैं। आध्यात्मिक प्रक्रिया को विद्यार्थियों में अनुशासन लाने का काम करना चाहिए, ताकि वे किसी चीज पर विश्वास न करें लेकिन इसी के साथ वे किसी के प्रति अभद्रता व असम्मान की भावना भी न रखें।अब समय आ गया है कि हम अपनी शिक्षा पद्धति के बारे में पुनर्विचार करें और उसे नए सिरे से तराशें, क्योंकि हमारे पास आर्थिक साधन आने वाले हैं। हमारे पास आज दुनिया तक पहुंचने का ऐसा मौका है जो अब से पहले कभी नहीं था और हमारे पास ऐसा नेतृत्व है, जो इन तमाम बदलावों को साकार करने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ है।
इसके विपरीत अगर हमने अपनी आबादी को अकुशल, लक्ष्य से भटकी हुई, अस्थिर और बिना प्रेरणा के छोड़ दिया तो यही आबादी हमारे लिए सबसे ज्यादा विनाशकारी साबित होगी।
आज अरबों डॉलर पैसा भारत से बाहर जा रहा है, क्योंकि लोग अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए बाहर भेज रहे हैं। आज तक हम अपने यहां शिक्षा का वह स्तर और जानकारी नहीं उपलब्ध करा पाए हैं, जो दुनिया की दूसरी जगहों पर उपलब्ध है। अगर हमें उच्च स्तरीय शिक्षा चाहिए तो हमें इसमें पैसा निवेश करना होगा। हम सरकार से इसकी अपेक्षा नहीं कर सकते। यह चीज आम लोगों और बिजनेसमैन की ओर से आनी चाहिए। किसी भी चीज में निवेश तभी होगा, जब उस क्षेत्र से लोगों को प्रतिफल मिलेगा। अगर आप कारोबार को शोषण का साधन नहीं बनाते तो यह कोई बुरी चीज नहीं है। शोषण को हटाने का तरीका कोई कानून नहीं हो सकता है, बल्कि अगर प्रतिस्पर्धा होगी और लोगों के पास फैसला करने का विकल्प होगा तो शोषण रुकेगा। प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करती है कि जिसके पास भी चीज अच्छी होगी, लोग उसी के पास जाएंगे। माता-पिता और स्कूल के बीच यह सहमति बननी चाहिए कि किस तरह की शिक्षा दी जाए।
फिलहाल बहुत सारे माता-पिता यह सोचते हैं कि एक बार उन्होंने अगर अपने बच्चों को स्कूल भेज दिया तो उनका कर्तव्य पूरा हो गया। यह सोच बदलनी चाहिए। अगर अपने बच्चों की पढ़ाई के प्रति आपकी ही कोई प्रतिबद्धता नहीं होगी तो फिर शिक्षकों को समर्पित क्यों होना चाहिए?
इसकी जिम्मेदारी हम सब पर आती है कि हम सभी अपनी शिक्षा पद्धति में कुछ नया करें। इस देश का हर वयस्क अपने स्तर पर जो कुछ भी कर सकता है, वह शिक्षा के क्षेत्र में अपनी भागीदारी अवश्य दे। यह हर व्यक्ति की चिंता होनी चाहिए। जिस तरह से आज अपने यहां पारिस्थितिकी (इकोलॉजी) को लेकर काफी चर्चा हो रही है और इस दिशा में हर कोई कुछ न कुछ करने की कोशिश कर रहा है, उसी तरह से हर किसी को शिक्षा के क्षेत्र में भी अपना योगदान देने की कोशिश करनी चाहिए।
शोषण को हटाने का तरीका कोई कानून नहीं हो सकता है, बल्कि अगर प्रतिस्पर्धा होगी और लोगों के पास फैसला करने का विकल्प होगा तो शोषण रुकेगा।
खासकर 125 करोड़ की आबादी वाले भारत जैसे देश में, जहां दुनिया की कुल आबादी का छठवां हिस्सा रहता हो। हालांकि हमारे प्राचीन कवियों ने इस देश की सुंदरता को लेकर तमाम रूमानी कविताएं लिखी हैं, जिसका आनंद मैंने भी खूब उठाया है और मैं भी इसकी सुंदरता का कायल रहा हूं, लेकिन हमें इस सच्चाई को भी स्वीकारना होगा कि आज 125 करोड़ लोगों के लिए हमारे पास न तो पर्याप्त जमीन बची है, न ही पहाड़, न नदियां और न ही पर्याप्त आसमान। हमारे पास अगर कुछ है तो सिर्फ एक बड़ी आबादी। अगर हम इस आबादी को एक स्थिर, टिकाऊ, लक्ष्य की ओर केंद्रित, प्रेरित और कौशलयुक्त बना लेते हैं तो आने वाले 25 सालों में हम सबसे बड़ा चमत्कार होंगे। जहां पूरी दुनिया की नजरें हमारी ओर होंगी। इसके विपरीत अगर हमने अपनी आबादी को अकुशल, लक्ष्य से भटकी हुई, अस्थिर और बिना प्रेरणा के छोड़ दिया तो यही आबादी हमारे लिए सबसे ज्यादा विनाशकारी साबित होगी।अगर हम लोग सही वक्त पर सही चीजें नहीं करेंगे तो हो सकता है कि आने वाले समय में हम इंसान नहीं, बल्कि इंसान के रूप में जानवर तैयार करें। हालांकि हमने आज ही उनमें से कई जानवरों को दुनिया में पैदा कर दिया है। यही वजह है कि आज शिक्षा सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है।अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में एक वादा सभी को करना चाहिए कि वह जो भी करेंगे, उसमें वह असत्य से सत्य की ओर बढ़ेंगे – जो चीज़ काम नहीं करती, उसे छोड़कर उस चीज़ को अपनाएंगे, जो काम करती है। खासकर शिक्षा के क्षेत्र में, क्योंकि आने वाले समय में इस दुनिया में जीवन कैसे होगा, इसका निर्धारण शिक्षा प्रणाली से ही होगाअगर आप इस देश की पांरपरिक शिक्षा-प्रणाली की ओर मुड़कर देखें तो माता-पिता या अभिभावक अपने बच्चों को एक ऐसे शिक्षक या आचार्य या गुरु को सौंप दिया करते थे, जिसे वह न सिर्फ एक ज्ञानी इंसान के तौर देखते थे, बल्कि एक सिद्ध या कहें विकसित प्राणी के रूप में भी देखते थे। वे जानते थे कि अगर उनके बच्चे ऐसे इंसान के हाथों में हैं तो वे स्वाभाविक रूप से खिल उठेंगे।
हमें स्कूलों का निर्माण इस तरह से करना चाहिए, जहां हर बच्चा जाना चाहे। इसके लिए हमें बच्चों से पहले बड़ों को शिक्षित करने की जरूरत है। बच्चे कुदरती तौर पर खुशमिजाज होते हैं और वे आबादी का ऐसा हिस्सा हैं, जिनके साथ काम करना सबसे आसान होता है। तो फिर सवाल है कि पढ़ाने के लिए माहौल को खुशनुमा बनाना एक मुश्किल काम क्यों हो जाता है? आज हमारे पास ऐसे कई वैज्ञानिक और चिकित्सकीय प्रमाण मौजदू हैं, जिनसे साबित होता है कि अगर आप एक खुशनुमा माहौल में होते हैं तो आपका शरीर व दिमाग सर्वश्रेष्ठ तरीके से काम करता है। अगर आप एक भी पल बिना उत्तेजना, चिड़चिड़ाहट, चिंता, बैचेनी या गुस्से के रहते हैं, अगर आप सहज रूप से खुश रहते हैं, तो कहा जाता है कि बुद्धि का इस्तेमाल करने की आपकी क्षमता एक ही दिन में सौ फीसदी बढ़ सकती है।शिक्षक ही तो इस समाज को चिकित्सा, इंजीनियर , आई एस अफसर, वैज्ञानिक और न जाने क्या क्या देता है ! ये समाज इन शिक्षकों का सदैव ऋणी रहा है तथा आगे भी रहेगा ! इनको समय समय पर उचित सम्मान देना हम सब की ज़िम्मेदारी भी है और कर्तव्य भी. परन्तु साथ ही शिक्षकों को भी सदैव अपनी भूमिका को समझना होगा और पूर्णनिष्ठा के साथ इसका निर्वहन भी करना ही होगा ! तभी देश में शिक्षा का गिरता हुआ स्तर ऊपर उठ सकेगा और एक कर्तव्यनिष्ठ, जागरूक, निष्ठावान, प्रतिभावान नागरिक देश को मिल सकेगा जिस पर राष्ट्र को अभिमान होगा !हमारी शिक्षा व्यवस्था को सुधारने के लिए अभिभावकों को भी जागरूक करने की भी आवश्यकता है क्योंकि शिक्षा क्षेत्र में अनेक सरकारी परियोजनाओं के बारे में अभिभावक जानकारी के अभाव में बच्चों की शिक्षा पर विशेष ध्यान नहीं दे पाते। स्कूली शिक्षा में सुधार के लिए हमें वर्तमान शैक्षिक उद्देश्यों को भी पुनरीक्षित करना होगा। शिक्षा, महज परीक्षा पास करने या नौकरी/रोजगार पाने का साधन नहीं है। शिक्षा विद्यार्थियों के व्यक्तित्व विकास, अन्तर्निहित क्षमताओं के विकास करने और स्वथ्य जीवन निर्माण के लिए भी जरूरी है। हमें शिक्षा के लिए हमारी शिक्षा की नीतियों की जी कमियाँ है उन्हें दूर करना ही होगा । जिससे शिक्षा के स्तर में सुधार हो सके ।आजादी के 70 साल बीत जाने के बाद भी सरकारी नियंत्रण वाले प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों में न तो शिक्षा का स्तर सुधर पा रहा है और न ही इनमें विद्यार्थियों को बुनियादी सुविधाएं मिल पा रही हैं। जाहिर है कि प्राथमिक स्कूलों में शिक्षा के सुधार के लिए जब तक कोई बड़ा कदम नहीं उठाया जाता, तब तक हालात नहीं बदलेंगे। निम्न मध्यवर्ग और आर्थिक रूप से सामान्य स्थिति वाले लोगों के बच्चों के लिए सरकारी स्कूल ही बचते हैं। आज भी देश की एक बड़ी आबादी सरकारी स्कूलों के ही आसरे है। फिर वे चाहे कैसे हों। इन स्कूलों में न तो योग्य अध्यापक हैं और न ही मूलभूत सुविधाएं। बड़े अफसर और वे सरकारी कर्मचारी जिनकी आर्थिक स्थिति बेहतर है, अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाते हैं।यंहा अगर हम बात करें समाज की तो दो दशक पहले के समाज में अभिभावक शिक्षकों को भगवान् से भी ज्यादा सम्मान देते और दिलाते थे अपने बच्चे की हर अच्छी बुरी बात से अध्यापक को परिचित कराते थे. पालक सरकारी स्कूल के अध्यापक से भी व्क्यतीगत तथा जीवंत संबंध रखते थे l बच्चे की गलती पर स्वयं उसे न डांटकर उसके अध्यापकों के सामने उसकी गलती का खुलासा करते थे और अध्यापक उन्हीं के समक्ष बच्चे को समझाते थे और बच्चा भी अपने अध्यापक के हर एक शब्द को अक्षरत: पालन कर उनकी महत्ता को प्रदर्शित करता था. परन्तु आज का समय बदल चुका है, परिवार बिखर चुके हैं माता-पिता अपनी एक या दो संतानों को बड़े ही नाजों से पालते हैं ऐसे में उनके बच्चे को किसी भी प्रकार की असुविधा उन्हें गवारा नहीं. जिस देश में भगवान् श्री कृष्ण और सुदामा एक ही आश्रम में शिक्षित हुए हों उस देश में आज विद्यालयों का विभाजन हो चुका है. विद्यार्थियों की योग्यता इन सभी बातों से बुरी तरह से प्रभावित हो रही है.शिक्षा के गिरते स्तर के कारण उसकी गुणवत्ता पर प्रश्न खड़ा होना जरुरी है। लेकिन इस बात के जिम्मेदार कौन लोग है। इस ओर न तो राजनीतिक मंथन हो रहा ना ही सामाजिक चिंतन किया जा रहा है। बातें शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने की अक्सर सुनने में आती है। किन्तु सुधार कहीं नजर नहीं आता । वह तो हमारी शिक्षा नीति में बहुत सुधार की आवश्यकता है
शिक्षा एक अंत तक चलने वाली प्रक्रिया है। मनुष्य जन्म से मृत्यु पर्यंत इस प्रक्रिया से गुजरता हुआ कुछ न कुछ सीखता ही रहता है। अगर हम शिक्षा की आज तक की गई तमाम परिभाषाओं को एक साथ रख दे और फिर कोई शिक्षा का अर्थ ढूंढे तो भी हमें कोई ऐसा अर्थ नहीं मिलेगा जो अपने आप में पूर्ण हो। वर्तमान में शिक्षा का अर्थ केवल स्कूली शिक्षा से लिया गया है अपितु शिक्षा हर प्रकार की हो सकती है जैसे तकनीकी शिक्षा व्यवसाइक शिक्षा इत्यादि l
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